पलटन फ़िल्म समीक्षा Paltan J P Datta
पलटन : फिल्म समीक्षा
©विधुभूषण
भारत चीन युद्ध 1962 तो आप ने खूब सुना होगा फ़िल्म के सुरुआत का दृश्य यही से है फिर सहीदो के घर आते तार फ़िल्म सुरु के 10 मिनट में ही फ़्लेवर बता देती है लेकिन मूल विषय भारत चीन नाथुला संघर्ष 1967 है जिसमे चीन को घुटनो पर आना पड़ा और अजेय चीन का हौआ भारतीय सैनिकों खत्म कर दिया
युद्ध फिल्मकार जे.पी. दत्ता का प्रिय विषय रहे हैं। इस पर उन्होंने 'बॉर्डर', 'एलओसी कारगिल', जैसी फिल्में बनाई हैं। और ताजा फिल्म 'पलटन' भी इसी विषय पर है जो कि एक सत्य घटना पर आधारित है।
1962 में हुए युद्ध के कुछ वर्षों बाद नाथू ला दर्रे पर एक भीषण सैन्य संघर्ष हुआ था। चीन की बढ़ती घुसपैठ से भारतीय सैनिक खुश नहीं थे। उन्होंने सीमा पर फेंसिंग करने का निर्णय लिया जो चीनियों को पसंद नही आया। उन्होंने धावा बोल दिया इस बार भारतीय तैयार थे और मुहतोड़ जवाब दिया।
चीन को यकीन नहीं था कि भारतीय सैनिक इतनी बहादुरी से मुकाबला करेंगे। उन्होंने भारतीय सैनिकों की ताकत को कम आंका था, लेकिन मेजर जनरल सगत सिंह (जैकी श्रॉफ), ले.कर्नल राय सिंह यादव (अर्जुन रामपाल), मेजर बिशन सिंह (सोनू सूद), कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर (गुरमीत चौधरी), मेजर हरभजन सिंह (हर्षवर्धन राणे) अतर सिंह (लव सिन्हा) और उनके साथियों ने चीनी सैनिकों को ऐसा जवाब दिया कि 3 दिन में चीन सफ़ेद झंडा लेकर खड़ा हो गया ।
नाथू ला सैन्य संघर्ष और सैनिकों की बहादुरी के बारे में ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है। इस घटना को फिल्म में दिखाने का जेपी दत्ता का फैसला सराहनीय है , लेकिन एक फिल्मकार के रूप में फ़िल्म का संपादन और तकनीकी पक्ष कमजोर है ।
फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले जेपी दत्ता का ही है ।
जेपी दत्ता बहुत गहराई में भी नहीं गए। उन्होंने सीमा के तनाव को तो अच्छे से दर्शाया है, लेकिन उस समय की राजनीतिक परिस्थितियां को उन्होंने नहीं दिखाया है।
फिल्म की शुरुआत अच्छी है और अंत बेहतरीन लेकिन बीच मे थोड़ी धीमी गति से चलती है लेकिन कहानी की मांग के कारण चल जाएगी ।
फ़िल्म के अंतिम दृश्यों में भीषण युद्ध होता है और युद्ध दृश्यों के फिल्मांकन में दत्ता साहब सिद्धहस्त है। दिखती है कि सैनिक कैसे देश के लिए सब कुछ झोंक देता है ? जब एक दृश्य में घायल कैप्टन डागर चीन की सुरंग को अपने शरीर पर ग्रेनेट लपेट कर उड़ा देते है रोंगटे खड़े हो जाते है ।
फिल्म का अंत उन्होंने अच्छे से किया है जो सैनिकों के प्रति सम्मान जगाता है और इमोशनल भी करता है।
फिल्म की सिनेमाटोग्राफी शानदार है और पहाड़ियों के साथ-साथ संघर्ष वाले सीन भी अच्छे से फिल्माए गए हैं। फिल्म में गानों से बचा जा सकता था।
कुल मिला कर बॉर्डर फ़िल्म से आप इसकी तुलना नही कर सकते उसके तो बार्डर तक भी नही है
लेकिन 1967 के नाथुला संघर्ष में घुटने टेकने वाली कहानी जिसे लालपंथी छिपाते है उसे उजागर करने हेतु दत्ता साहब को तिरंगा प्रणाम
मैं फ़िल्म को 5 में से साढ़े तीन अंक दूंगा
फ़िल्म देखने लायक है
#क्यो_देखें_ अगर भारत और सेना पर गर्व हो और 1967 संघर्ष को समझना हो
क्यो न देखे - अगर आप चीन परस्त है या केवल मसाला फिल्मे ही पसंद हो
निर्माता : ज़ी स्टूडियो, जे.पी. फिल्म्स
निर्देशक : जे.पी. दत्ता
संगीत : अनु मलिक
कलाकार : जैकी श्रॉफ, अर्जुन रामपाल, सोनू सूद, गुरमीत चौधरी, हर्षवर्धन राणे, सिद्धांत कपूर, लव सिन्हा, ईशा गुप्ता
फ़िल्म समीक्षा - विधुभूषण
Good
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